यशायाह 30:20-21
“यद्यपि मेरा यहोवा परमेश्वर तुम्हें दु:ख और कष्ट दे सकता है ऐसे ही जैसे मानों वह ऐसा रोटी—पानी हो, जिसे तुम हर दिन खाते—पीते हो। किन्तु वास्तव में परमेश्वर तो तुम्हारा शिक्षक है, और वह तुमसे छिपा नहीं रहेगा। तुम स्वयं अपनी आँखों से अपने उस शिक्षक को देखोगे। तब यदि तुम बुरे काम करोगे और बुरा जीवन जीओगे (दाहिनी ओर अथवा बायीं ओर) तो तुम अपने पीछे एक आवाज़ को कहते सुनोगे, “खरी राह यह है। तुझे इसी राह में चलना है।”
आपके पीछे से आती आवाज़ की अगुवाई
हम में से ज़्यादातर लोग यही सोचते हैं कि जब ज़िंदगी में मुश्किल वक्त आता है, तो इसका मतलब है कि परमेश्वर पीछे हट गए हैं। हम सोचते हैं कि अगर हम सच में परमेश्वर के करीब होते, तो सब कुछ आसान होता। लेकिन यशायाह 30 इस सोच को पूरी तरह पलट देता है।
यशायाह के ज़माने में परमेश्वर के लोग बड़ी मुश्किल में थे। उन्होंने परमेश्वर पर भरोसा करने की बजाय मिस्र से मदद माँगी, और इसके गंभीर नतीजे भुगतने पड़े। यशायाह जिस "दुख की रोटी" और "तकलीफ के पानी" का ज़िक्र करता है, वो कोई काव्य-भाषा नहीं थी। वो असली दर्द था, जो गलत चुनावों और टूटे हुए हालात से आता है। फिर भी, उसी कठिन दौर के बीच में परमेश्वर कुछ हैरान करने वाली बात कहते हैं: "तुम्हारा उपदेशक अब और नहीं छुपेगा।"
गौर करें कि मुश्किल का मतलब परमेश्वर की गैरमौजूदगी नहीं है। बल्कि यशायाह कहता है कि यही तकलीफ का वक्त है जब परमेश्वर एक उस्ताद की तरह हमारे पास आते हैं। कठिन समय हमें धीमा कर देता है और सुनने पर मजबूर करता है। जब सब कुछ ठीक चल रहा होता है, तो हम अक्सर लापरवाह हो जाते हैं। लेकिन जब मुश्किलें आती हैं, तब हम सच में ध्यान देने लगते हैं।
आयत 21 की तस्वीर बहुत कोमल और निजी है। परमेश्वर की आवाज़ आपके पीछे से आती है, जैसे एक चरवाहा अपने झुंड के पीछे चलता है और जब कोई भेड़ भटकने लगती है तो पुकारता है। "यही रास्ता है, इसी पर चलो।" यह कोई जटिल नक्शा नहीं है, कोई पाँच साल की योजना नहीं है। बस सही वक्त पर एक शब्द, जो आपको वापस सही राह पर ले आता है।
परमेश्वर अक्सर इसी तरह अपने लोगों की अगुवाई करते हैं। हमेशा किसी बड़े दर्शन के ज़रिए नहीं, बल्कि एक हल्की-सी थपकी के ज़रिए। बाइबल का कोई वचन जो आज दिल में अलग तरह से उतरे। किसी दोस्त का एक सवाल जो आपको रोक दे। वो बोल रहे हैं, बस सवाल यह है कि क्या हम सुन रहे हैं।
अगर आप अभी किसी मुश्किल दौर से गुज़र रहे हैं, तो इस तकलीफ को परमेश्वर की चुप्पी मत समझिए। इसे एक दावत समझिए, धीमे पड़ने की, परमेश्वर का वचन खोलने की, और अपने पीछे से आती उस आवाज़ को सुनने की।
परमेश्वर उन लोगों की अगुवाई नहीं करते जो अपना रास्ता खुद चुनना चाहते हैं। वो उनकी अगुवाई करते हैं जो अपना रास्ता उनके हाथों में सौंपने के लिए तैयार हैं।— Elisabeth Elliot
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