फिलिप्पियों 4:8
“हे भाईयों, उन बातों का ध्यान करो जो सत्य हैं, जो भव्य है, जो उचित है, जो पवित्र है, जो आनन्द दायी है, जो सराहने योग्य है या कोई भी अन्य गुण या कोई प्रशंसा”
जब लड़ाई परमेश्वर की हो
यह एहसास कि सब तरफ से दुश्मन घिरे हैं, बिल्कुल सच्चा है, और परमेश्वर इसे जानता है। राजा यहोशाफात भी यही महसूस कर रहा था।
तीन सेनाएं यरूशलेम की तरफ बढ़ रही थीं, और राजा के पास कोई सैनिक जवाब नहीं था। उसने पूरी कौम को बुलाया, उपवास रखा और प्रार्थना की। उसी बेबस भीड़ के बीच याहजीएल नाम के एक नबी ने खड़े होकर परमेश्वर का संदेश सुनाया, डरो मत, क्योंकि यह लड़ाई तुम्हारी नहीं है, यह परमेश्वर की है।
गौर करो कि परमेश्वर ने क्या नहीं कहा। उसने यह नहीं कहा कि खतरा छोटा है, बल्कि उसने उस दुश्मन को "बड़ी भीड़" कहा। परमेश्वर यहोशाफात से यह नहीं कह रहा था कि समस्या को नजरअंदाज करो, वह कह रहा था कि समस्या को सही नजरिए से देखो, यह इंसान से बड़ी जरूर है, लेकिन परमेश्वर से बड़ी नहीं।
सबसे जरूरी बात यह है कि डर तब ताकतवर बनता है जब हम अपनी मुश्किलों को तो नापते हैं, लेकिन अपने परमेश्वर को भूल जाते हैं। जैसे ही हम एक कदम पीछे हटकर याद करते हैं कि असल में कौन सब कुछ थामे हुए है, सब कुछ बदल जाता है। मुश्किल छोटी नहीं हुई, बस परमेश्वर हमारी नजर में और बड़ा हो गया।
यही वह जगह है जहाँ ईमान रहता है, खतरे की गैरमौजूदगी में नहीं, बल्कि उस खतरे के बीचोबीच परमेश्वर की मौजूदगी में।
जैसा कि A.W. Tozer ने कहा, "एक इंसान की आत्मिक सेहत ठीक उतनी ही होती है जितना उसका परमेश्वर से प्रेम।" जब परमेश्वर पर हमारा प्यार और भरोसा मजबूत होता है, तो हम बड़ी से बड़ी मुश्किल के सामने भी टूटते नहीं।
तो अभी तुम्हारी जिंदगी में वह "बड़ी भीड़" क्या है? कोई रिश्ता जो टूटा हुआ लगता है और ठीक होने की उम्मीद नहीं? पैसों की ऐसी तंगी जो पीछा नहीं छोड़ती? डॉक्टर की कोई रिपोर्ट जिसने पैरों तले जमीन खिसका दी?
आज उसे परमेश्वर के सामने रखो, ठीक वैसे जैसे यहोशाफात ने रखा था, सच्चाई और नम्रता के साथ। फिर रुको और देखो।
यह लड़ाई तुम्हारी नहीं है, यह परमेश्वर की है।
एक इंसान की आत्मिक सेहत ठीक उतनी ही होती है जितना उसका परमेश्वर से प्रेम।— A.W. Tozer
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