मीका 6:8
“हे मनुष्य, यहोवा ने तुझे वह बातें बतायीं हैं जो उत्तम हैं। ये वे बातें हैं, जिनकी यहोवा को तुझ से अपेक्षा है। ये वे बातें हैं—तू दुसरे लोगों के साथ में सच्चा रह; तू दूसरों से दया के साथ प्रेम कर, और अपने जीवन नम्रता से परमेश्वर के प्रति बिना उपहारों से तुम उसे प्रभावित करने का जतन मत करो।”
तीन चीज़ें जो परमेश्वर सच में चाहता है
हम में से ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि हम जानते हैं परमेश्वर हमसे क्या चाहता है, और हमारे मन में एक लंबी-चौड़ी सूची आ जाती है, जैसे नियमों का बोझ, हर हफ्ते बिना नागा गिरजाघर जाना, या ऐसा शांत समय जिसमें कोई रुकावट न आए। लेकिन भविष्यवक्ता मीका इन सब बातों को एक तरफ हटाकर एक बहुत सीधा जवाब देता है।
मीका ने ये शब्द लगभग 700 ईसा पूर्व लिखे, जब इस्राएल एक बार फिर परमेश्वर से दूर भटक गया था। लोग धर्म के बाहरी दिखावे में लगे हुए थे, बलिदान चढ़ा रहे थे,礼拝 में आ रहे थे, लेकिन उनके दिल ठंडे पड़ चुके थे। वे गरीबों को ठगते थे, कमज़ोरों की परवाह नहीं करते थे, और ऐसे जीते थे जैसे परमेश्वर को बस रस्मों से मतलब हो। तब मीका ने परमेश्वर की तरफ से एक सीधा सवाल रखा, मैं तुमसे असल में क्या चाहता हूँ? जवाब में तीन बातें हैं, और हर एक पर थोड़ा रुककर सोचना ज़रूरी है।
पहली बात, न्याय के साथ चलो। यानी सही काम करो, खासकर उन लोगों के साथ जिनके पास तुमसे कम ताकत है। यह दिखता है इस बात में कि तुम किसी सहकर्मी के साथ कैसे पेश आते हो, किसी दुकानदार के साथ, या उस पड़ोसी के साथ जो तुम्हारा एहसान कभी नहीं चुका सकता।
दूसरी बात, दया से प्यार करो। ध्यान दो, परमेश्वर सिर्फ यह नहीं कहता कि दया करो, वो कहता है दया से प्यार करो। वो चाहता है कि तुम्हें दयालु होने में खुशी मिले, कि तुम मन मारकर नहीं बल्कि दिल से माफ करो। दया तुम्हारे लिए घर जैसी होनी चाहिए, क्योंकि परमेश्वर के साथ तुम्हारा रिश्ता भी तो उसी दया की बुनियाद पर टिका है।
तीसरी बात, अपने परमेश्वर के साथ नम्रता से चलो। यही वो जड़ है जिससे बाकी सब कुछ पलता है। परमेश्वर के सामने नम्र रहने का मतलब है कि तुम याद रखो तुम कौन हो और वो कौन है। यही नम्रता न्याय को घमंड बनने से रोकती है और दया को दिखावा बनने से।
ये तीन बातें सुबह उठकर जल्दी से निपटाने वाले काम नहीं हैं, ये उस ज़िंदगी की पहचान हैं जो परमेश्वर के करीब जीई जाती है। ऑस्वाल्ड चेम्बर्स ने एक बार लिखा था, "यीशु का अपने शिष्यों के लिए सबसे बड़ा शब्द है समर्पण।" यही पूरा समर्पण है जो नम्रता से चलने में दिखता है, हर साधारण दिन में।
आज परमेश्वर से माँगो कि वो तुम्हें एक छोटी सी जगह दिखाए जहाँ तुम न्याय, दया या नम्रता को जी सको। वहीं से शुरुआत करो।
यीशु का अपने शिष्यों के लिए सबसे बड़ा शब्द है समर्पण।— Oswald Chambers
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